Tuesday, May 10, 2011

सर झुकाओगे तो.... - भावानुवाद



दगडास रंगवूनी, बनवून देव त्याला
करता कितीक भक्ती, म्हणता कृतघ्न झाला?          

मज ठाव चोख आहे, मज ही खुबी प्रवाही
बस चाललो जिथे मी, रस्ता तिथेच झाला  

म्हणलास जीवना तू, कसल्या ख-या दिलाने!
जर तू न होय माझा, दुसरा कुणी मिळाला ! 

स्मरतोय ईश्वराला, मदिरेस प्राशताना
बनलाय अमृताचा, जहरी नसेच प्याला  

सगळ्या महाभुतांचा बस एक तोच स्वामी
वसलेत कोण कोठे, दिसतेच सर्व त्याला

-
मूळ रचना: सर झुकाओगे तो....
मूळ कवी: बशीर बद्र
भावानुवाद: ....रसप....
१० मे २०११

वृत्त कल्याणी (स्वामीजी कृत): ललगालगा लगागा ललगालगा लगागा


मूळ रचना:

सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा
इतना मत चाहो उसे, वो बेवफ़ा हो जाएगा


हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा


कितनी सच्चाई से मुझ से ज़िन्दगी ने कह दिया
तू नहीं मेरा, तो कोई दूसरा हो जाएगा


मैं ख़ुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तो
ज़हर भी इसमें अगर होगा, दवा हो जाएगा


सब उसी के हैं हवा, ख़ुश्बू, ज़मीनो-आसमाँ
मैं जहाँ भी जाऊँगा, उसको पता हो जाएगा



- बशीर बद्र

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