Saturday, July 30, 2011

दिन जल्दी-जल्दी ढलता है - भावानुवाद

काळ अचानक येत असे
इप्सित मानस दूर नसे
हाच विचार करून कुणी, श्रांत जिवात उमेद भरे
लौकर लौकर दिवस सरे  

वाट किती बघतात पिले
अन घरट्यातून नजर फिरे 
जाणुन हे चिमणी असते, जोर परांत पुनश्च चढे     
लौकर लौकर दिवस सरे  

कोण मला बघण्यास झुरे?
कोण मनी मम वास करे
प्रश्न मला छळतो, पिडतो; त्राण पदातुन क्षीण उरे 
लौकर लौकर दिवस सरे

(गालल गालल गालल गा)
मूळ कविता - दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
मूळ कवी - हरिवंशराय बच्चन
भावानुवाद - ....रसप....
२८ जुलै २०११   
मूळ कविता -
हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं -
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे -
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!


मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल? -
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!


- हरिवंशराय बच्चन

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